भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में हारता दिख रहा लोकतंत्र, स्थायी आय एवं संपत्ति आयोग के गठन की जरूरत: मदन गोबिंद राव
जन्मदिन पर रामकोला में पुरातन मित्रों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलन समारोह, पूर्व विधायक ने कहा—भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए बिना आर्थिक विषमता खत्म करना और भारत को विश्वशक्ति बनाना मुश्किल
गोरखपुर। पूर्व विधायक मदन गोबिंद राव ने भ्रष्टाचार को देश के संवैधानिक लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताते हुए स्थायी आय एवं संपत्ति आयोग के गठन की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि कड़े कानून, सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के तमाम दावों के बावजूद भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है। इसके खिलाफ प्रभावी लड़ाई के बिना न तो आर्थिक विषमता समाप्त हो सकती है और न ही भारत विश्वशक्ति बनने के लक्ष्य को हासिल कर सकता है।
पूर्व विधायक मदन गोबिंद राव अपने जन्मदिन के अवसर पर रामकोला में पुरातन मित्रों एवं कार्यकर्ताओं के मिलन समारोह को संबोधित करने के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश को बचाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नागरिकों को सामूहिक संकल्प लेना होगा।
आतंकवाद और संगठित अपराध के पीछे भ्रष्टाचार की ताकत
मदन गोबिंद राव ने कहा कि आतंकवाद, हिंसा, दंगा और संगठित अपराध जैसी समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं भ्रष्ट तंत्र की ताकत काम करती है। उनके मुताबिक भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के बिना इन समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
उन्होंने वर्ष 1992-93 के दौरान कश्मीर घाटी की अपनी अध्ययन यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय लोगों से बातचीत के दौरान उन्हें वहां की आतंकी हिंसा के पीछे भ्रष्ट व्यवस्था और कथित तौर पर लुटेरे राजनीतिक तंत्र की भूमिका का आभास हुआ था। उनका आरोप है कि अलगाववाद को हवा देकर राज्य की संपदा की लूट का रास्ता तैयार किया गया और विदेशी ताकतों ने इसका रणनीतिक लाभ उठाया।
उन्होंने यह भी कहा कि व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के कारण कुछ क्षेत्रों में नक्सल आंदोलन को अनुकूल वातावरण मिला।
बड़े-बड़े आंदोलन हुए, लेकिन भ्रष्टाचार पर नहीं लगी लगाम
पूर्व विधायक ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन, बोफोर्स कांड के खिलाफ आंदोलन और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि देश में समय-समय पर भ्रष्टाचार, महंगाई और आर्थिक असमानता के खिलाफ बड़े आंदोलन हुए। इन आंदोलनों के बाद सरकारें भी बदलीं, लेकिन भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग सका।
उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी कांग्रेस शासनकाल में इन्हीं मुद्दों को लेकर आंदोलनों में शामिल रहे और इस दौरान लगभग 14-15 बार जेल गए। इसके बावजूद भ्रष्टाचार का दानव कुछ समय बाद फिर सिर उठाता रहा।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मजबूत नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके बावजूद भ्रष्टाचार का दायरा लगातार बढ़ने की शिकायतें आमजन को निराश कर रही हैं।
तहसीलों और थानों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
मदन गोबिंद राव ने न्यायिक व्यवस्था, तहसीलों और थानों में कथित भ्रष्टाचार पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ अदालतों की स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है। उनके अनुसार थानों और तहसीलों में संगठित आर्थिक अपराधियों जैसे तौर-तरीकों की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
उन्होंने बैनामे के बाद दाखिल-खारिज और वरासत से जुड़े मामलों की भौतिक जांच कराने की आवश्यकता जताई। उनका आरोप है कि कई जगह लेखपालों और कानूनगो के स्तर से लेकर तहसील के अधिकारियों तक पर मामलों के शीघ्र निस्तारण के नाम पर धन मांगने की शिकायतें मिलती हैं।
उन्होंने कुशीनगर जिले में नारायणी नदी के तट पर कथित अवैध बालू खनन का एक पुराना उदाहरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि शिकायत मिलने पर एक एसडीएम मौके पर पहुंचे थे, लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा बालू लदी ट्रैक्टर-ट्रालियां दिखाने के बावजूद अधिकारी ने कथित तौर पर खनन की बात से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण बताया।
ठेकेदारों और जनप्रतिनिधियों की कथित मिलीभगत पर चिंता
पूर्व विधायक ने सरकारी परियोजनाओं में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बड़े प्रोजेक्ट के टेंडर इस तरह तैयार किए जाते हैं कि पसंदीदा फर्मों को लाभ पहुंचाया जा सके।
उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में जनप्रतिनिधि जिन परियोजनाओं को राज्य स्तर पर स्वीकृत नहीं करा पाते, उन्हें ठेकेदार अपने प्रभाव से पास करा लेते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय कुछ जनप्रतिनिधियों के साझेदार बनने की स्थिति भी चिंता का विषय है।
मदन गोबिंद राव ने अपना व्यक्तिगत अनुमान बताते हुए कहा कि तहसीलों में प्रतिमाह पांच से दस करोड़ रुपये और थानों में 50 लाख रुपये से अधिक की वसूली नागरिकों से की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत आकलन है। उनके अनुसार कुछ ईमानदार अधिकारी भी व्यवस्था में मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्थिति नदी के बीच बने टापू जैसी हो गई है।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए स्थायी आय एवं संपत्ति आयोग बनाने का सुझाव
मदन गोबिंद राव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी और संस्थागत लड़ाई के लिए कई सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि देश में एक स्थायी आय एवं संपत्ति आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इसके दायरे में सभी स्तरों के जनप्रतिनिधियों के साथ मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के जिला और राज्य स्तरीय पदाधिकारियों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने प्रमुख रूप से निम्नलिखित सुधारों की आवश्यकता बताई—
1. जन सूचना अधिकार अधिनियम को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
2. सिटिजन चार्टर के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान हो।
3. बेलगाम चुनावी खर्च पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाए।
4. स्थायी एवं स्वतंत्र आय और संपत्ति आयोग का गठन किया जाए।
5. मजबूत, स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकपाल संस्था बनाई जाए।
6. अधीनस्थ अदालतों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए प्रत्येक कमिश्नरी में न्यायिक निगरानी की प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाए।
उन्होंने कहा कि यदि भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लग जाए तो ग्रामीण बाजारों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं। लोगों की बचत बढ़ेगी और बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से उत्पादन चक्र को भी मजबूती मिल सकती है।
राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने की भी उठाई मांग
पूर्व विधायक ने राजनीतिक दलों की आंतरिक जवाबदेही को लेकर भी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि दलीय लोकतंत्र में ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ता तैयार करना और उन्हें प्रशिक्षित करना राजनीतिक दलों का कर्तव्य है।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के आधा दर्जन से अधिक राज्य एवं केंद्र स्तरीय पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि आर्थिक और गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाते हैं तो उस दल की मान्यता पांच वर्षों तक निलंबित करने जैसे प्रावधान पर विचार किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले निराधार आरोपों और अपुष्ट खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाने के लिए कानून में बदलाव की आवश्यकता भी बताई। उनका सुझाव है कि ऐसे मामलों में न्यायालय के निर्णय और प्रमाणिक तथ्यों को महत्व दिया जाना चाहिए।
आंदोलनों के इतिहास से सबक लेने की जरूरत
अपने संबोधन के अंत में मदन गोबिंद राव ने पंजाब में 1971-72 के दौरान सिनेमा टिकट के दाम बढ़ने के विरोध में हुए आंदोलन, गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और संपूर्ण क्रांति आंदोलन का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जनभावनाओं और जनसमस्याओं की अनदेखी करने का परिणाम सत्ता के लिए गंभीर हो सकता है। इतिहास गवाह है कि जनता के असंतोष को समय रहते समझना और उसका समाधान करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
उन्होंने देशवासियों से भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने तथा देश को बचाने का संकल्प लेने की अपील की।
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